डिप्थीरिया

डिप्थीरिया एक संक्रामक रोग है। यह रोग कोराइन बैक्टीरियम डिप्थीरिया के कारण होता है, जो कि मुख्यतः गले और ऊपरी वायुमार्ग को संक्रमित करता है तथा टॉक्सिन एवं अन्य अंगों को प्रभावित करता है। अन्य प्रकार का डिप्थीरिया गले और कभी-कभी टॉन्सिल को प्रभावित करता है। अन्य प्रकार के डिप्थीरिया के कारण त्वचा पर अल्सर हो जाते हैं; यह सामान्यत: उष्णकटिबंधीय में अधिक होता हैं (उन स्थानों पर जहाँ बारहों महीने औसत तापमान कम से कम 18 °C रहता है)। डिप्थीरिया विशेषत: 1 से 5 वर्ष की आयु के बच्चों को प्रभावित करता है। डिप्थीरिया शीतोष्ण जलवायु में (चार मौसम ग्रीष्म, शरद ऋतु, सर्दी एवं वसंत है) अर्थात् ठंडे महीनों के दौरान होता है। 
 
डिप्थीरिया के खिलाफ़ टीकाकरण से होने वाली मृत्यु दर और रुग्णता प्रभावशाली तरीके से कम हुयी है; हालाँकि डिप्थीरिया अभी भी कई देशों में, जहाँ पर टीकाकरण (ईपीआई) विस्तारित कार्यक्रम की ख़राब कवरेज है, वहां पर यह प्रमुख बाल स्वास्थ्य समस्या है। भारत जैसे डिप्थीरिया वाले स्थानिक देशों में, यह रोग ज़्यादातर छिटपुट मामलों या कम प्रकोप के रूप में होता है। 
 
डिप्थीरिया उच्च मृत्यु दर के साथ छोटे बच्चों में 5 - 10% मामलों में घातक हो सकता है। एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी), राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) दिल्ली ने भारत में वर्ष 2014 के दौरान डिप्थीरिया के 7 प्रकोपों की सूचना दी थी। 
 
संदर्भ: 
 
पार्क की पाठ्यपुस्तक, रोकथाम और सोशल मेडिसिन, 22वां संस्करण, डिप्थीरिया, 151-153
 

 
बीमारी की गंभीर शुरुआत होती है तथा दो से तीन दिनों के भीतर मुख्यतः गले में ख़राश, हल्का बुख़ार और गर्दन की ग्रंथियों में सूजन से जाना जाता हैं।
 
मोटी कोटिंग का निर्माण गले या नाक में हो सकता हैं। यह साँस लेने व निगल में मुश्किल पैदा करता है।मोटी ग्रे कोटिंग को "सूडोमेम्ब्रेन" कहा जाता है।
 
लैरिंजियल डिप्थीरिया प्राय: खांसी और गला ख़राब होने पर निकलने वाली आवाज के साथ प्रकट होता है।
 
गंभीर मामलों में टॉक्सिन मायोकार्डिटिस या पेरिफेरल न्यूरोपैथी का कारण हो सकता है। 
 
संदर्भ:

 
डिप्थीरिया का कारण कोराइन बैक्टीरियम डिप्थीरिया है। यह ग्राम सकारात्मक और अगतिशील जीव है। इसके पास कोई आक्रामक शक्ति नहीं है, लेकिन यह शक्तिशाली एक्सोटॉक्सिन पैदा करता है। डिप्थीरिया बेसिली गर्मी और रासायनिक एजेंटों के माध्यम से आसानी से मारे जाते हैं।
 
डिप्थीरिया टोक्सिन के कारण गले और टॉन्सिल के ऊपर मृत ऊतक की मेम्ब्रेन (झिल्ली) निर्मित होती है तथा यह साँस लेने और निगल में मुश्किल पैदा करती है।
 
संचारण:
 
संचारण सबसे अधिक प्राय: श्वसन तंत्र से व्यक्ति से व्यक्ति में प्रसारित होता है। संचरण त्वचा के घावों या संक्रमित व्यक्तियों के घावों से निकलने वाले (फॉरमेंटस) गंदे पदार्थों से शायद ही कभी प्रकट होता है। इसकी ऊष्मायन अवधि 2-6 दिनों की होती है, लेकिन कभी-कभी यह अवधि लंबी हो सकती है। 
 
संदर्भ:

आमतौर पर डिप्थीरिया का निदान नैदानिक प्रस्तुतिकरण के आधार पर किया जाता है क्योंकि संभावित चिकित्सा जल्दी शुरू करना अनिवार्य है।
 
प्रयोगशाला निदान में शामिल हैं:
 
क) नैदानिक नमूनों से जीव को (त्वचीय डिप्थीरिया की स्थिति में गले व नाक के स्वाब और स्वाब को त्वचा के ज़ख़्मों और घावों से एकत्र किया जाता हैं) अलग (आइसोलेशन) किया जाता है।
i) स्टैन्ड स्मीयर का सूक्ष्म परीक्षण (ग्राम स्टैनिंग या अल्बर्ट स्टैनिंग) स्वाब से तैयार किया जाता है।
ii) कल्चर- कल्चर के दौरान सी डिप्थीरिया के किसी भी संदिग्ध आइसोलेट्स को निम्नलिखित परीक्षण के अधीन किया जाना चाहिए।
1. बायोटाइपिंग। 
2. टॉक्सिजेंसिटी परीक्षण (ऐलेक्स परीक्षण)। 
3.न्यूनतम निरोधात्मक एकाग्रता (एमआईसी) (ई-परीक्षण) विधि द्वारा एंटीबायोटिक संवेदनशीलता परीक्षण।
 
ख) सीरोलॉजिकल परीक्षण- एंटीबॉडी टाईटर की चार गुणा वृद्धि को अप्रत्यक्ष हीमएग्लूटिनेशन परीक्षण (आईएचए) या एंजाइमलिंक्ड इम्युनोसोरबेंट असे (एलिसा) परीक्षण द्वारा दस से चौदह दिनों के अंतराल पर एकत्रित (दोनों नमूने डिप्थीरिया टोक्साइड या एंटीटोक्सिन को देने से पहले एकत्र किये जाते है) युग्म सीरा नमूने में पाया जाता है।
 
संदर्भ:

उपचार में बैक्टीरिया को मारने के लिए एंटीबायोटिक और टॉक्सिन के प्रभाव को बेअसर करने के लिए डिप्थीरिया एंटीटोक्सिन दिया जाना शामिल है। 
 
डिप्थीरिया विशेषत: श्वसन डिप्थीरिया के उपचार में सबसे महत्वपूर्ण तत्व ज़ल्दी से ज़ल्दी डिप्थीरिया एंटीटोक्सिन देना है। 
 
एंटीटोक्सिन के अलावा हर मामले को उचित एंटीबायोटिक दवाओं के साथ उपचारित किया जाना चाहिए।
 
आवश्यकतानुसार श्वसन सहायता व वायुमार्ग को स्थिर बनाए रखने के लिए मदद भी प्रदान की जानी चाहिए। 
 
आमतौर पर यह रोग एंटीबायोटिक लेने के 48 घंटे के बाद संक्रामक नहीं होता है।
 

डिप्थीरिया से होने वाली जटिलताओं में निम्नलिखित शामिल है:
  • वायुमार्ग में रुकावट।
  • हृदय मांसपेशियों की क्षति (मायोकार्डिटिस)।
  • तंत्रिकाओं की सूजन, जिसके कारण तंत्रिकाओं की क्षति हो सकती है (पोलीन्यूरोपैथी)।
  • पक्षाघात।
  • फेफड़े में संक्रमण (सांस लेने में दिक्कत या निमोनिया)।
संदर्भ:

बच्चों में डिप्थीरिया रोकने का सबसे प्रभावी उपाय सभी बच्चों को सक्रिय प्रतिरक्षण प्रदान करना है। भारत में यूनिवर्सल टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) के तहत इसकी सिफ़ारिश की जाती है।
 
एकल एंटीजन डिप्थीरिया टीकाकरण उपलब्ध नहीं है। सामान्यत: टीकाकरण अन्य टीकों जैसे कि डीपीटी के टीके (डिप्थीरिया + पर्टुसिस + टेटनस टोक्साइड) या पेंटावेलेंट वैक्सीन (डीपीटी + हैप बी + हिब वैक्सीन) के साथ मिलाकर दिया जाता है। 
 
यूआईपी में डीपीटी की 5 खुराकों की सिफ़ारिश की जाती हैं। तीन खुराकें 6, 10 और 14 सप्ताहों तथा दो बूस्टर ख़ुराक: एक बूस्टर ख़ुराक 16 से 24 महीने की अवस्था एवं दूसरी बूस्टर ख़ुराक 5 से 6 वर्ष की अवस्था में दी जाती है। यदि किसी बच्चे को डीपीटी में होने वाले पर्टुसिस टीके के घटक से परेशानी होती है, तो पेडियाट्रिक डीटी का टीका दिया जाना चाहिए। 
 
किशोरों और वयस्कों को प्राय: टिटनेस टोक्साइड के साथ कम मात्रा में डिप्थीरिया टोक्साइड दिया जाता है।
 
भारत में यूआईपी के तहत चयनित राज्यों में पेंटावेलेंट वैक्सीन का उपयोग भी किया जाता है।
 
डब्ल्यूएचओ ने टीकाकरण रहित 7 वर्ष की अवस्था तथा उससे अधिक आयु की अवस्था तक के बच्चों के लिए सलाह दी है कि दो खुराकें, 1 से 2 महीनों के अंतराल और तीसरी ख़ुराक 6 से 12 महीनों के बाद दी जानी चाहिए। इसके बाद बूस्टर ख़ुराक को लंबी अवधि तक सुरक्षा देने के लिए कम से कम 1 वर्ष के अंतराल पर 5 बार दिया जा सकता है।
 
बूस्टर खुराक: टिटनेस की बूस्टर खुराक और डिप्थीरिया (टॉक्सॉयड) टोक्साइड युक्त टीकों को प्राथमिक सीरिज व दस वर्ष पहले टीकाकरण लेने वाले बड़े बच्चों को दिया जाना चाहिए।
 
संदर्भ:
 

  • PUBLISHED DATE : Aug 18, 2016
  • PUBLISHED BY : Zahid
  • CREATED / VALIDATED BY : Sunita
  • LAST UPDATED ON : Aug 18, 2016

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