असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव (एब्नार्मल यूटराइन ब्लीडिंग)

असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव (एब्नार्मल यूटराइन ब्लीडिंग)
 
परिचय
 
असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव (एयूबी) प्रजनन योग्य आयु वाली (गैर-गर्भवती) महिलाओं में एक सामान्य समस्या है। पहले इसे ‘दुष्क्रिया गर्भाशय रक्तस्राव’ के नाम से जाना जाता था। एयूबी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य समस्या और सामाजिक शर्मिंदगी के लिए उत्तरदायी है तथा यह उन सामान्य कारणों में से एक है, जिसमें महिलाओं को स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता होती हैं। यह महिलाओं की जीवन की गुणवत्ता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। असामान्य रक्तस्राव से पीड़ित महिलाओं में सामान्य महिलाओं की तुलना में जीवन की गुणवत्ता कम होती है।
 
मासिक धर्म या रजोधर्म या माहवारी चक्र की सामान्य अवधि 24 दिनों से लेकर 38 दिनों के बीच होती है। सामान्य मासिक धर्म सामान्यत: 8 दिनों तक रहता है। असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव (एयूबी) में गर्भाशय से खून बहता है, जो कि सामान्य से अधिक होता है या जो कि अनियमित समय (गर्भावस्था के दौरान रक्तस्राव के अलग-अलग कारण होते हैं) पर होता है।
 
एयूबी प्रजनन क्षति उत्पन्न करता है तथा इसके परिणामस्वरूप शल्य चिकित्सा संबंधी हस्तक्षेप की आवश्यकता हो सकती है। एयूबी की मासिक धर्म और रजोनिवृत्ति के बीच नौ से चौदह प्रतिशत महिलाओं में होने की सूचना मिली है। हर देश में व्यापकता अलग-अलग है। भारत में एयूबी व्यापकता की सूचना लगभग 17.9% है।
 
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ गायनोकोलॉजी एंड ऑब्स्टेट्रिक्स (फिगो), माहवारी विकार कार्यरत समूह ने ‘दुष्क्रिया गर्भाशय रक्तस्राव (डीयूबी)’ शब्द का उपयोग छोड़ने का प्रस्ताव दिया है, जबकि ‘असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव (एयूबी) और अत्यधिक मासिक धर्म रक्तस्राव (एचएमबी)’ शब्द का उपयोग जारी रखा है। एचएमबी में मीनोमैट्रोरेजिया (मासिक धर्म के दौरान और अनियमित अंतराल पर अत्यधिक गर्भाशय रक्तस्राव) मैट्रोरेजिया (अनियमित अंतराल पर रक्तस्राव) और पॉलीमीनोरिया (अधिक बार माहवारी आना) शामिल हैं। एचएमबी को “मासिक धर्म में अत्यधिक रक्त क्षति” के रूप में परिभाषित किया गया है, जो कि महिलाओं की शारीरिक, भावनात्मक, सामाजिक और भौतिक गुणवत्ता में हस्तक्षेप करती है तथा जो कि अकेले हो सकती है या अन्य लक्षणों के संयोजन में भी हो सकती है।
 
एयूबी के नामकरण को मानकीकृत करने के लिए, जिसे परिवर्णी पाम-कोइन के नाम से जाना जाता है, इस नई प्रणाली को वर्ष 2011 में आईआईजीओ द्वारा शुरू किया गया था। पाम-कोइन प्रणाली एटियलजि और पैथोलॉजी पर आधारित है, जिसमें पाम- संरचनात्मक कारणों (पॉलीप; ऐडेनोमायोसिस; लिओम्योमा; मलिग्नन्सी और हाइपरप्लासिया) का वर्णन करता है तथा कोइन- एयूबी के गैर-संरचनात्मक कारणों (कोऐग्यलोपैथी; ओव्यूलेट्री डिसआर्डर; एंडोमेट्रियल फैक्टर्स; आइऐट्रजेनिक/चिकित्सकजनित; और वर्गीकृत नहीं) को दर्शाता है।
 
प्रजनन योग्य आयु वाली महिलाओं में असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव कई पैथोलॉजिक विकारों में से किसी एक की अभिव्यक्ति है।
 
संदर्भ-

लक्षण
 
असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव निम्नलिखित लक्षणों में से किसी के रूप में हो सकता है-
 
मासिक धर्म के दौरान रक्तस्राव या रक्त का धब्बा।
मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव।
माहवारी चक्र अधिकतम 38 दिनों या न्यूनतम 24 दिनों का होता है।
मासिक चक्र में अनियमितता, जिसमें चक्र की अवधि 7-9 दिनों से अधिक होती है।
यौन संभोग के बाद रक्तस्राव या रक्त का धब्बा।
रजोनिवृत्ति के बाद रक्तस्राव। 
 
(सामान्य मासिक धर्म चक्र- माहवारी चक्र की सामान्य अवधि 24 दिनों से 38 दिनों के बीच होती है। सामान्य मासिक धर्म चक्र सामान्यत: आठ दिनों तक रहता है।)
 
असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव किसी भी उम्र में हो सकता है। हालांकि, रजोदर्शन (लगभग 9-14 वर्ष की आयु में, जब एक लड़की को पहली बार मासिक धर्म शुरू होता हैं) और रजोनिवृत्ति से पूर्व (मीनोपॉज से पूर्व का समय) (चालीसवें वर्ष के मध्य) के दौरान, एयूबी अधिक सामान्य है।
 
संदर्भ-

कारण
 
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ गायनोकोलॉजी एंड ऑब्स्टेट्रिक्स (फिगो) ने असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव के कारणों को परिभाषित करने के लिए वर्ष 2011 में वर्गीकृत पाम-कोइन प्रणाली शुरू की। एयूबी के एटियलजि की नौ मुख्य श्रेणियां हैं, जो कि परिवर्णी पाम-कोइन के अनुसार व्यवस्थित हैं।
 
पाम समूह के घटकों के संरचनात्मक कारण हैं, जो कि इमेजिंग तकनीकों और/या हिस्टोपैथोलॉजी से बिना देखे पता लगाए जा सकते हैं। इसका कारण पॉलीप; ऐडेनोमायोसिस; लिओम्योमा; मलिग्नन्सी और हाइपरप्लासिया है।
 
गर्भाशय पॉलिप (एयूबी-पी)- गर्भाशय पॉलीप्स एंडोमेट्रियम (गर्भाशय की आंतरिक परत) से विकसित होते हैं तथा गर्भाशय गुहा में पाए जाते हैं। ये आमतौर पर सौम्य होते हैं, लेकिन कुछ कैंसरपूर्व या कैंसर हो सकते हैं। 
 
ऐडेनोमायोसिस (एयूबी-ए)- यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें गर्भाशय की आंतरिक परत (एंडोमेट्रियम), गर्भाशय मांसपेशियों की दीवार (मायोमेट्रियम) तक बढ़ जाती है। यह स्थिति मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक दर्द के साथ-साथ सामान्य मासिक रक्तस्राव की तुलना में अधिक और भारी रक्तस्राव उत्पन्न करती है।
 
लिओम्योमा (एयूबी-एल)- ये मायोमेट्रियम के सौम्य फाइब्रोमास्क्युलर (तंतुपेशीय) ट्यूमर हैं। लियोमायोमा को कई नामों से जाना जाता है, जिसमें "मायोमा," और "फाइब्रॉएड" शामिल हैं।
 
मैलिग्नेंसी और हाइपरप्लासिया (एयूबी-एम)- मैलिग्नेंसी और एटिपिकल हाइपरप्लासिया एयूबी से जुड़ा हैं तथा प्रजनन आयु की लगभग सभी महिलाओं में इस पर महत्व दिया जाना चाहिए।
 
कोइन समूह एयूबी के गैर-संरचनात्मक कारणों से संबंधित है, जिसे इमेजिंग या हिस्टोपैथोलॉजी द्वारा परिभाषित नहीं किया जाता हैं। इसके कारण कोऐग्यलोपैथी; ओव्यूलेट्री डिसफंक्शन; एंडोमेट्रियल; आइऐट्रजेनिक/चिकित्सकजनित है; तथा अभी तक इन्हें वर्गीकृत नहीं किया गया है।
 
कोऐग्यलोपैथी (एयूबी-सी)- "कोऐग्यलोपैथी" शब्द में हेम्योस्टेसिस का दैहिक विकार शामिल हैं, जो कि एयूबी से जुड़ा हो सकता हैं। कोऐग्यलोपैथी (एयूबी-सी) (जिनमें से एक, वॉन विलेब्रांड रोग) या दैहिक हेम्योस्टेसिस के विकारों की व्यापकता और प्रयोगशाला प्रभाव, अत्यधिक मासिक धर्म रक्तस्राव (एचएमबी) के साथ लगभग तेरह प्रतिशत महिलाओं में पहचाना जा सकता है।
 
ओव्यूलेट्री डिसफंक्श (दुष्क्रिया)- ओव्यूलेशन विकार विभिन्न मासिक धर्म संबंधी असामान्यताओं के रूप में उपस्थित हो सकते हैं, जिसकी परिधि एमेनोरिया (मासिक धर्म का न होना), अत्यंत हल्का और असामान्य रक्तस्राव, अप्रत्याशित अत्यधिक माहवारी रक्तस्राव है। ‘ओव्यूलेट्री विकार’ ओव्यूलेट्री पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, हाइपोथायरायडिज्म, हाइपरप्रोलैक्टिनेमिया, मानसिक तनाव, मोटापा, एनोरेक्सिया, वज़न में कमी, अत्यधिक व्यायाम के साथ जुड़ा हो सकता है। ओव्यूलेट्री विकार अक्सर प्रजनन योग्य आयु: किशोरावस्था और रजोनिवृत्ति पूर्व (मीनोपॉज से पूर्व का समय) में अधिक दिखाई देता है। महिलाएं जब रजोनिवृत्ति के नज़दीक पहुंचती हैं, तब उनका माहवारी का चक्र छोटा हो जाता है तथा अक्सर रुक-रुक कर एनोओव्यूलेट्री हो जाता है।
 
एंडोमेट्रियल (एयूबी-ई)- जब सामान्य गर्भाशय रक्तस्राव सामान्य ओव्यूलेट्री प्रक्रिया के साथ एंडोमेट्रियम की असामान्यताओं के कारण तथा कोऐग्यलोपैथी के बिना होता है, तब इसे एयूबी-ई के नाम से जाना जाता है।
 
आइएट्रोजनिक/चिकित्साजनित (एयूबी-आइ)- असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव इक्सोजनस गोनाडल स्टेरॉयड, इंट्रायूटेराइन डिवाइस के उपयोग या अन्य दैहिक या स्थानीय एजेंटों के साथ जुड़ा है। इसे आइएट्रोजनिक (एयूबी-आइ) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
 
अभी तक वर्गीकृत नहीं किया गया (एयूबी-एन)- ‘अभी तक वर्गीकृत नहीं’ की श्रेणी, उन तत्वों को समायोजित करने के लिए बनाई गयी थी, जिनका शायद ही कभी पता लगाया गया हो या जिसकी स्पष्ट परिभाषा न हो।
 
 
संदर्भ-

निदान
 
एयूबी के कारण का पता लगाने के लिए विस्तृत इतिहास और शारिरिक परीक्षण प्राथमिक घटक है तथा प्रबंधन के लिए मार्गदर्शक विकल्पों और अंतिम निदान के लिए सुझावात्मक परीक्षणों में भी मदद करता है। एयूबी से पीड़ित महिला में कई कारक हो सकते है, जो कि एयूबी की उत्पत्ति में योगदान देते हैं या कभी-कभी पैथोलॉजी (जैसे कि सबसेरोसल लिओम्योमा) उपस्थित होता है, लेकिन एयूबी के लिए उत्तरदायी नहीं होता है। महिला में प्रसव आयु, गर्भावस्था और इससे संबंधित जटिलताओं को बाहर रखा जाना चाहिए।
 
इतिहास में निम्नलिखित शामिल होना चाहिए-
 
रक्तस्राव की मात्रा, आवृत्ति और नियमितता; डिसमेनोरिया (कष्टयुक्त मासिकस्राव) या महावारी पूर्व लक्षण-
 
o ओव्यूलेट्री एयूबी सामान्यत: नियमित होता है तथा अक्सर महावारी पूर्व लक्षणों और डिसमेनोरिया (कष्टयुक्त मासिकस्राव) से जुड़ा होता है।
 
o एनोओव्यूलेट्री रक्तस्राव अक्सर अनियमित, भारी और लंबे समय तक होता है, जो कि रजोदर्शन और पेरिमीनोपॉज़ (जब किसी महिला का शरीर अपनी प्रजनन शक्ति को स्थायी रूप से बंद करने के संक्रमण से गुजर रहा होता है) के समीप अधिक सामान्य है।
 
मैथूनोत्तर या इंटर मेंस्ट्रुअल ब्लीडिंग/अंतर रक्तस्राव की उपस्थिति।
 
o इंटर मेंस्ट्रुअल ब्लीडिंग/अंतर रक्तस्राव या मैथूनोत्तर रक्तस्राव स्त्री रोग संबंधी कैंसर का पहला लक्षण हो सकता है।
 
एनीमिया के सांकेतिक लक्षण (जैसे कि कमजोरी, गतिविधियों के साथ सांस में तकलीफ)।
 
यौन और प्रजनन इतिहास (गर्भनिरोधक, यौन संचारित संक्रमण, भविष्य में गर्भावस्था की इच्छा, बांझपन, गर्भाशय ग्रीवा परीक्षण के बारे में)।
 
सामाजिक और यौन कार्यशीलता तथा जीवन की गुणवत्ता पर प्रभाव।
 
रक्तस्राव के दैहिक कारण जैसे कि हाइपोथायरायडिज्म, हाइपरप्रोलैक्टिनेमिया, कोऐग्यलेशन डिसऑर्डर्स (स्कंदन विकार), पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम के सूचक लक्षण।
 
संबंधित लक्षण जैसे कि योनि स्राव, पेल्विक/श्रोणि या पेडू में दर्द या दबाव।
 
परीक्षण: एयूबी से पीड़ित महिला के शारीरिक परीक्षण में निम्नलिखित शामिल हैं-
 
वजन, पीलापन, थायराइड, स्तन, मुंहासे, हर्सुटिज्म स्कोरिंग (यदि उपस्थित है) का मूल्यांकन।
 
पेट को छूकर देखना।
 
गर्भाशय ग्रीवा को देखना।
 
दोनों हाथों से (आंतरिक) परीक्षण।
 
प्रयोगशाला परीक्षण-
 
पूर्ण रक्त गणना (सीबीसी)- एनीमिया का पता लगाने के लिए एचएमबी के साथ सभी महिलाओं में पूर्ण रक्त गणना परीक्षण किया जाना चाहिए।
 
रक्त प्रकार तथा दाता और ग्राही के रक्त में अनुकूलता परीक्षण।
 
गर्भावस्था का पता लगाने के लिए मूत्र (गर्भावस्था) परीक्षण।
 
रक्तस्राव विकारों के मूल्यांकन के लिए परीक्षण-
 
रक्तस्राव समय, प्लेटलेट गणना, प्रोथ्रोम्बिन समय और आंशिक थ्रोम्बोप्लास्टिन समय की सलाह सभी किशोरों और वयस्कों में कोऐग्युलोपैथीज़ के सकारात्मक इतिहास के साथ की जाती है।
 
महिलाएं, जिन्हें रजोदर्शन के समय से एचएमबी हो चुका है तथा व्यक्तिगत या पारिवारिक इतिहास सांकेतिक कोऐग्यलेशन विकार से पीड़ित है, में कोऐग्यलेशन विकार (जैसे कि वॉन विलेब्रांड रोग) के लिए परीक्षण को महत्व दिया जाना चाहिए।
 
थायराइड परीक्षण केवल तब किया जाना चाहिए, जब थायराइड रोग के अन्य संकेत और लक्षण उपस्थित हों।
 
यकृत कार्यप्रणाली परीक्षण।
 
संरचनात्मक और हिस्टॉलॉजिकल/ऊतकीय असामान्यताओं का पता लगाने के लिए परीक्षण: इमेजिंग-
 
अल्ट्रासोनोग्राफी का उपयोग एयूबी मामलों में गर्भाशय, एडनेक्सा और एंडोमेट्रियल मोटाई का मूल्यांकन करने के लिए किया जाता है। ‘ट्रांसवेजिनल अल्ट्रासोनोग्राफी’ लिओम्योमा, एंडोमेट्रियल मोटाई या फोकल द्रव्यमान दर्शाता हैं।
 
सोनोहिस्ट्रोग्राफी- यह गर्भाशय गुहा और एंडोमेट्रियल हाइपरप्लासिया के अंदर के घावों का पता लगाने में अधिक विशिष्ट और संवेदनशील है।
 
हिस्टेरोस्कोपी- इससे इंट्रायूटेराइन (अंतर्गर्भाशयी) असामान्यताओं के निदान और निरूपण के लिए हिस्टेरोस्कोप का उपयोग करके गर्भाशय गुहा और एंडोमेट्रियम (गर्भाशय की आंतरिक परत) की सतह का परीक्षण किया जाता है।
 
एमआरआई (मैगनेटिक रिसोनैंस इमेजिंग या चुम्बकीय अनुनाद प्रतिबिम्बन)- एमआरआई का उपयोग फाइब्रॉएड (गर्भाशय की रसौली) और ऐडेनोमायोसिस के बीच अंतर करने तथा जबकि संरक्षणवादी सर्जरी की योजना बनाते समय  फाइब्रॉएड के सटीक स्थान का पता लगाने और फाइब्रॉएड (गर्भाशय की रसौली) के लिए एंबोलाइजेशन थेरेपी से पूर्व किया जाता है। 
 
एंडोमेट्रियल बायोप्सी/हिस्टोपैथोलॉजी- एंडोमेट्रियल बायोप्सी के तहत गर्भाशय की अंदरूनी परत का एक छोटा सा ऊतक या कोशिका का नमूना लिया जाता है, जिसकी आमतौर पर माइक्रोस्कोप द्वारा जांच की जाती है। बिना देखे नमूने (एक प्लास्टिक ट्यूब गर्भाशय ग्रीवा से गुजरती है, जिसका उपयोग खिंचाव द्वारा एंडोमेट्रियम प्राप्त करने के लिए किया जाता है) का उपयोग करके या हिस्टेरोस्कोप के साथ प्रत्यक्ष दृश्य के दौरान एंडोमेट्रियम प्राप्त किया जाता है। इसका उद्देश्य साइटोलॉजिकल एटिपिया या एंडोमेट्रियल कार्सिनोमा के साथ एंडोमेट्रियल हाइपरप्लासिया की पूर्व-घातक स्थिति का पता लगाना है।
 
कम्प्यूटर टोमोग्राफी (सीटी)- यह एक्स-रे प्रक्रिया आंतरिक अंगों और संरचनाओं को त्रिविमीय में दिखाती है।
 
संदर्भ-

प्रबंधन
 
जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने के क्रम में उपचार के किसी भी प्रकार का मुख्य उद्देश्य मासिक धर्म के प्रवाह को कम करना है। एक्यूट (तीव्र) एयूबी प्रबंधन के दो मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं:
 
1) भारी रक्तस्राव के वर्तमान प्रकरण को नियंत्रित करना और
 
2) बाद वाले मासिक चक्रों में माहवारी के दौरान रक्त की क्षति को कम करना।
 
चिकित्सा पद्धति को महत्वपूर्ण प्रारंभिक उपचार माना जाता है। संरक्षणात्मक और गर्भाशय-सुरक्षात्मक उपचार विकल्प प्रारंभ में उपयोग किए जाते हैं; हालांकि, अप्रभावी चिकित्सा उपचार और कुछ स्थितियों में शीघ्र शल्य चिकित्सा प्रबंधन की आवश्यकता होती है।
 
एक बार रक्तस्राव के एक्यूट (तीव्र) प्रकरण को नियंत्रित कर लेने के बाद चिकित्सा उपचार को दीर्घकालिक उपचार के रूप में शुरू किया जाता है। चिकित्सा पद्धति में उपचार के कई विकल्प उपलब्ध हैं, जिनमें लिवोनोगेस्ट्रल इंट्रायूटेराइन सिस्टम (एलएनजी-आईयूएस), विस्तारित या मासिक चक्र (ओसीएस) में मौखिक गर्भ निरोधक गोली, प्रोजेस्टिन थेरेपी (मौखिक या इंट्रामस्क्युलर), ट्रेनेक्सामिक एसिड, गैरस्टेरायडल एंटी इनफ्लमेटरी दवाएं और गोनाडोट्रोपिन रिलीजिंग हॉर्मोन (जीएनआरएच) एगोनिस्ट्स शामिल हैं। 
 
शल्य चिकित्सा- जब एयूबी चिकित्सीय थेरेपी के प्रतिक्रिया नहीं करता है, तो रक्तस्राव को नियंत्रित करने के लिए शल्य प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। शल्य चिकित्सा संबंधी उपचार प्रयोगशाला पुष्टि, रक्तस्राव की गंभीरता, चिकित्सा प्रबंधन के अंतर्विरोध और प्रतिक्रिया तथा अंतर्निहित चिकित्सा स्थिति, महिलाओं की उम्र एवं प्रजनन स्थिति (यदि वह बच्चे पैदा करना चाहती है) पर आधारित है।
 
पॉलीप के हिस्टेरोस्कोपिक को शल्य चिकित्सा से हटाना- पॉलीप्स, जो कि एयूबी का कारण है, उसके लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए हटाया जा सकता है और यहां तक कि स्पर्शोन्मुख पॉलीप्स में कैंसर की संभावना को दूर करने के लिए निकालने की आवश्यकता होती है।
 
एंडोमेट्रियल एब्लेशन गर्भाशय की परत को नष्ट करता है। यह रक्तस्राव की समस्त मात्रा को रोकता या कम करता है।
 
गर्भाशय धमनी एम्बोलिज़्म एक प्रक्रिया है, जिसका उपयोग फाइब्रॉएड (गर्भाशय की रसौली) के उपचार के लिए किया जाता है। यह प्रक्रिया गर्भाशय में रक्त वाहिकाओं को अवरुद्ध करती है, जो कि रक्त प्रवाह रोकने में बदल जाती है, जिसकी आवश्यकता फाइब्रॉएड को बढ़ने के लिए होती है।
 
हिस्टेरोस्कोपिक सहवर्ती के साथ डाइलेशन (विस्तारण) और क्यूरेटेज (खुरच कर निकालना) उन रोगियों में महत्वपूर्ण होता है, जिनमें इंट्रायूटेराइन पैथोलॉजी का संदेह होता है या ऊतक के नमूने की आवश्यकता होती है।
मायोमेक्टोमी फाइब्रॉएड (गर्भाशय की रसौली) हटाने के लिए की जाती है।
 
हिस्टेरेक्टॉमी- हिस्टेरेक्टॉमी एक शल्यक्रिया है, जिसके माध्यम से किसी महिला के गर्भाशय को निकाला जाता है। यह सभी शल्यक्रियाओं में से एक बेहद सामान्य क्रिया है तथा इसमें फैलोपियन ट्यूब, अंडाशय और गर्भाशय ग्रीवा को हटाना भी शामिल किया जा सकता है। गर्भाशय के आकार, गतिशीलता, गर्भाशय में रसौली के स्थान, योनि के आकार और आकृति के आधार पर हिस्टेरेक्टॉमी को उदर (पेट) हिस्टेरेक्टॉमी (एएच), योनि हिस्टेरेक्टॉमी (वीएच) और लैप्रोस्कोपिक हिस्टेरेक्टॉमी जैसे अलग-अलग तरीकों से किया जा सकता है।
 
एचएमबी के लिए हिस्टेरेक्टॉमी को केवल प्रथम उपचार के रूप में उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। हिस्टेरेक्टॉमी को केवल तभी किया जाना चाहिए जब अन्य उपचार के विकल्प विफल हो गये हो या महिला द्वारा खण्डन या अस्वीकार कर दिए गये हो। एयूबी/एचएमबी से पीड़ित महिला को निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्वास्थ्य पेशेवरों से पर्याप्त समय और सहायता लेनी चाहिए।
 
संदर्भ-

रोकथाम
 
हालांकि असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव (एयूबी) को रोकने के लिए कोई विशेष उपाय नहीं हैं, लेकिन शीघ्र निदान और उपचार दीर्घकालिक जटिलताओं जैसे कि बांझपन, एनीमिया, हाइपोवोलेमिया को रोकने में मदद करता है।
 
कभी-कभी हार्मोनल परिवर्तन से उत्पन्न एयूबी को जीवन शैली हस्तक्षेप से रोका/कम किया जा सकता है, जिसमें स्वस्थ आहार उपभोग और व्यायाम, धूम्रपान निषेध, स्वस्थ वज़न बनाए रखना शामिल है।
 
संदर्भ-
 

  • PUBLISHED DATE : Mar 26, 2019
  • PUBLISHED BY : NHP Admin
  • CREATED / VALIDATED BY : Sunita
  • LAST UPDATED ON : Mar 26, 2019

Discussion

Write your comments

This question is for preventing automated spam submissions
The content on this page has been supervised by the Nodal Officer, Project Director and Assistant Director (Medical) of Centre for Health Informatics. Relevant references are cited on each page.