लेप्टोस्पाइरोसिस

लेप्टोस्पाइरोसिस
 
परिचय
 
यह एक संक्रामक रोग है जो कि लेप्टोस्पीरा प्रजाति के बैक्टीरिया के कारण होता है तथा यह मनुष्यों के साथ-साथ जानवरों दोनों को प्रभावित करता है।
 
लेप्टोस्पायरोसिस विश्व में व्यापक स्तर पर होने वाले संक्रामक रोगों में से एक है, जो कि जानवरों से मनुष्यों में फैलता है। आमतौर पर मनुष्य में संक्रमण संदूषित पानी से फैलता है जो कि पशु के मूत्र से दूषित होता है। यह शरीर में त्वचा, आंखों या श्लेष्म झिल्ली (त्वचा के चिटके/कटे हिस्से, किसी भी प्रकार के खुले घाव या स्क्रैच) के माध्यम से प्रवेश करता है।
 
अधिकांश मामलों में लेप्टोस्पायरोसिस के कारण हल्के फ्लू के समान लक्षण जैसे कि सिरदर्द, ठंड और मांसपेशियों में दर्द होता है। हालांकि, कुछ मामलों में संक्रमण अत्यधिक गंभीर होता है तथा जिसके कारण अंग की विफ़लता और आंतरिक रक्तस्राव सहित जीवन के लिए प्राणघातक समस्याएं उत्पन्न हो सकती है। लेप्टोस्पाइरोसिस के गंभीर प्रकार को वेल रोग के नाम से भी जाना जाता है।
 
लेप्टोस्पायरोसिस की रोकथाम और नियंत्रण के लिए कार्यक्रम।
 
 
संदर्भ: 
 
 
 
 

लक्षण
 
हल्के लक्षणों में निम्नलिखित शामिल हैं: 
 
• अधिक तापमान (बुख़ार), जो कि आमतौर पर 38 और 40 डिग्री सेल्सियस (100.4-104 डिग्री फारेनहाइट) के बीच होता है।
 
• अचानक सिरदर्द और ठंड लगना।
 
• मतली और उल्टी।
 
• भूख में कमी।
 
• मांसपेशियों में दर्द विशेषत: पिंडलियों और पीठ के निचले हिस्से की मांसपेशियों में दर्द।
 
• नेत्रश्लेष्मलाशोथ (आंखों में जलन और लालिमा)।
 
• खांसी।
 
• कम समय के लिए होने वाले दाने।
 
अधिक गंभीर स्थितियों में निम्नलिखित शामिल हैं:
 
• मेनिनजाइटिस।
 
• अत्यधिक थकान।
 
• बहरापन।
 
• सांस लेने में परेशानी।
 
• एज़ोटेमिया।
 
रेनल इंटरस्टीशियल ट्यूबलर नेक्रोसिस, जिसके परिणामस्वरूप गुर्दे की विफलता तथा कभी-कभी लीवर की विफलता हो जाती है, लेप्टोस्पाइरोसि के इस गंभीर प्रकार को वेल रोग के नाम से जाना जाता हैं। हालांकि कभी-कभी इसे वेल सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता है।
 
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कारण
 
लेप्टोस्पाइरोसिस लेप्टोस्पीरा नामक बैक्टीरिया के कारण होता है, जो कि संक्रमित जानवरों के पेशाब में पाया जाता है तथा यह संक्रमण जानवरों से मनुष्यों में फैलता है। कृदंत/कृंतक, मवेशी, भैंस, घोड़े, भेड़, बकरी, सूअर और कुत्तों को बैक्टीरिया का सामान्य स्रोत माना जाता है, जिसके कारण लेप्टोस्पाइरोसिस होता है।
 
लेप्टोस्पायरोसिस की ऊष्मायन अवधि सामान्यत: दो से तीस दिनों की अवधि के साथ पांच से चौदह दिन होती है।
 
लेप्टोस्पायरोसिस का प्रकोप संक्रमित ताज़े पानी के स्रोतों जैसे कि कुछ पानी से संबंधित खेलों के नज़दीकी संपर्क के कारण होता है। प्राकृतिक आपदा जैसे कि बाढ़ के बाद लोगों के संक्रमित होने की संभावना अधिक होती है।
 
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निदान
 
बैक्टीरिया के लिए एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए रक्त परीक्षण किया जाता है।
 
अन्य परीक्षणों में निम्नलिखित शामिल है:
 
एंजाइम-लिंक्ड इम्यूनोसार्बेंट एसे (एलिसा)। 
 
पॉलिमरेज़ चेन रिएक्शन (पीसीआर)।
 
एमएटी (माइक्रोस्कोपिक एग्ग्लुनेशन परीक्षण), जो कि एक सीरोलॉजिकल परीक्षण (सीरमीय परीक्षण, यह रक्त में एंटीबॉडी की जांच करने के लिए किए जाने वाला परीक्षण है) है, जिसे लेप्टोस्पायरोसिस का निदान करने में स्वर्ण मानक माना जाता है।
 
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प्रबंधन
 
लेप्टोस्पाइरोसिस को निम्नलिखित दवाओं से उपचारित किया जा सकता है, जैसे कि:
 
एम्पीसिलीन।
 
अज़िथ्रोमाइसिन। 
 
सेफ्ट्रियक्जोने।
 
डॉक्सीसाइक्लिन।
 
पेनिसिलिन।
 
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रोकथाम 
 
यद्यपि कुछ देशों में मनुष्यों के लिए टीकाकरण का उपयोग सफलता की विभिन्न डिग्री के साथ किया गया है, लेकिन वर्तमान में डब्ल्यूएचओ से मान्य पूर्व-योग्य टीकाकरण उपलब्ध नहीं है।
 
लेप्टोस्पायरोसिस के संचारण को रोकने वाले उपायों में निम्नलिखित शामिल हैं:
 
सुरक्षात्मक कपड़े (जूता, दस्ताना, चश्मा, एप्रन (तहबंद), मुखौटा) पहनना।
 
त्वचा के घावों को जलरोधक ड्रेसिंग (मरहम-पट्टी) से ढंकना।
 
जल निकायों के ज्ञात या संदिग्ध (पूल, तालाब, नदियों) दूषित होने के बारे में पर्याप्त चेतावनी देना या पहुंचने से रोकथाम।
 
संभावित दूषित पानी में चलने या तैराकी से बचने की कोशिश करना।
 
पेशाब के छींटों या संदूषित मिट्टी या पानी के संपर्क के बाद सफ़ाई करना या स्नान करना।
 
घाव धोना और सफ़ाई करना।
 
पेशाब के छींटों या ऐरोसॉल, रोगी या मरे जानवर को छुने या जानवरों को जन्म देने में सहयोग करने से बचाव या रोकथाम करना।
 
जानवरों को संभालने या उनकी देखभाल करने के दौरान अच्छी तरह से स्वच्छता अपनाना।
 
जहां तक संभव है वहां तक दूषित क्षेत्रों (अस्तबल, कसाईखाने और बूचड़खाने की ज़मीन को रगड़ कर साफ़ करें) को रोगाणुओं मुक्त (कीटाणुनाशन) करना। 
 
साफ़, स्वच्छ और सुरक्षित पानी पीना।
 
संदर्भ:
 

  • PUBLISHED DATE : Aug 05, 2018
  • PUBLISHED BY : NHP Admin
  • CREATED / VALIDATED BY : Sunita
  • LAST UPDATED ON : Aug 05, 2018

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