पोलियो

परिचय
 
पोलियो शब्द यूनानी भाषा के स्लेटी (ग्रे) और मीलोन (मज्जा, जो कि रीढ़ की हड्डी को दर्शाता है) से व्युत्पन्न हुआ है। पोलियोमेलाइटिस वायरस रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करता है, जो कि पक्षाघात की क्लासिक स्थिति उत्पन्न करता है। पोलियोमाइलाइटिस या पोलियो विकलांग/अशक्त कर देने वाला और संभावित घातक संक्रामक रोग है। यह रोग पोलियोवायरस के कारण होता है। यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। यह संक्रमित व्यक्ति के मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी पर आक्रमण करता है, जिससे पक्षाघात होता है। मनुष्य पोलियो वायरस का एकमात्र ज्ञात स्रोत हैं, जो कि संक्रमित व्यक्तियों से सबसे अधिक फैलता है। 
 
आज तक किसी उपचार की अनुपलब्धता के कारण टीकाकरण रोग से बचाव एवं नियंत्रण का सबसे बेहत्तर उपाय है। 
 
आमतौर पर पोलियो संक्रमण के दो आधारभूत पैटर्न हैं:
 
  • न्यून रुग्णता, जो कि केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सीएनएस) से संबंध नहीं है, उसे कभी-कभी अबोर्टिव पोलियोमेलाइटिस कहा जाता है।

 

  • गंभीर रुग्णता, जिसमें सीएनएस शामिल है, जिसमें लकवाग्रस्त (पैरलिटिक) या अलकवाग्रस्त (नॉन पैरलिटिक) लक्षण हो सकते है। 
 
पोलियोमेलाइटिस सामान्यत: मल-मौखिक मार्ग से फैलता है। यह रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में मुख से मुख मार्ग और संक्रमित आहार खाने और पानी से फैलता है। प्रकोप वाले क्षेत्रों में पोलियो वायरस संपूर्ण मानव आबादी को प्रभावित करता हैं। समशीतोष्ण जलवायु में रोग का मौसमी संचारण होता है, जो कि गर्मी और पतझड़ के दौरान सबसे ज़्यादा होता है।
 

 

लक्षण 
 
  • पोलियो के सभी 95% मामलों में व्यक्ति में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते है। ये मामले अलक्षणी (एसिम्प्टमैटिक) होते है। बिना लक्षण के संक्रमित व्यक्ति के मल में वायरस होता हैं तथा वह दूसरे व्यक्तियों में वायरस संचारित करने में सक्षम होता है।
 
  • लगभग चार से आठ प्रतिशत पोलियो वायरस से पीड़ित रोगियों में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर आक्रमण के नैदानिक या प्रयोगशाला पुष्टि के बिना न्यून रुग्णता (रोग) होती है। इसे अबोर्टिव पोलियोमेलाइटिस के नाम से जाना जाता है तथा एक सप्ताह से कम में पूरी तरह से ठीक हो जाता है। पोलियोवायरस संक्रमण के इस प्रकार के साथ तीन लक्षण ऊपरी श्वसन पथ में संक्रमण (गले में खराश और बुखार), जठरांत्र गड़बड़ी (मतली, उल्टी, पेट में दर्द, कब्ज या डायरिया) और इन्फ्लूएंजा जैसे पाये जाते है।
 
एक से दो प्रतिशत पोलियो संक्रमण अपक्षाघातीय अवस्था (नॉनपैरालिटिक असेप्टिक मेनिन्जाइटिस) (गर्दन, पीठ और/या पैर की अकड़न के लक्षण) उत्पन्न करते हैं तथा ऊपर उल्लेख किए गए लक्षणों के कई दिनों तक रहने के बाद न्यून रुग्णता के लक्षण विकसित हो जाते है।
 
संवेदनशीलता में बढ़ोत्तरी या असामान्यता भी हो सकती है। आमतौर पर यह लक्षण पूरी तरह से ठीक होने तक दो से दस दिन रहते है।
 
  • पोलियो संक्रमण में एक प्रतिशत फ्लेसीड पैरालिसिस (झूलता हुआ पक्षाघात) होता है, जिसे कमजोरी या पक्षाघात और मांसपेशी टोन में कमी के नैदानिक प्रदर्शन (क्लिनिकल मैनफेस्टैशन) से जाना जाता है। पैरालिटिक लक्षणों की शुरुआत सामान्यत: न्यून रुग्णता लक्षणों के बाद एक से दस में होती हैं तथा ये लक्षण दो से तीन दिनों में वृद्धि करते है। आमतौर पर तापमान के वापिस सामान्य होने के बाद आगे कोई पक्षाघात नहीं होता है। कुछ संकेत और लक्षण, जैसे कि सुपरफिशियल रिफ्लेक्स की कमी, प्रारंभ में डीप टेंडन रिफ्लेक्स में बढ़ोत्तरी और मांसपेशियों में दर्द एवं अंग या पीठ में ऐंठन शामिल है। डीप टेंडन रिफ्लेक्स में कमी से रोग, फ्लेसीड पैरालाइसिस (झूलता हुआ पक्षाघात) में विकसित हो जाता है, दिनों से हफ्ते में परिवर्तन के बिना उसी स्थिति तक रहता है तथा यह सामान्यत: ऐसमेट्रिकल स्थिति है, उसके बाद थोड़ी-थोड़ी ताकत आ जाएगी।
 
  • रोगी को संवेदनशीलता में कमी या अनुभूति में बदलाव महसूस नहीं होता है। पैरालिटिक पोलियोमेलाइटिस से पीड़ित अधिकांश रोगी पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं तथा अधिकत्तर मामलों में कुछ स्तर तक मांसपेशियों की प्रक्रिया वापिस आ जाती है। यदि शुरूआत के 12 महीनों के बाद भी कमजोरी या पक्षाघात रहता है, तो यह यह स्थिति स्थायी हो जाती है। 
 
संदर्भ:
 
 

कारण
 
पोलियोमेलाइटिस पोलियो वायरस बोले जाने वाले संक्रमण के कारण होता है। यह गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल मार्ग विशेषत: ग्रसनी और आंत में रहता है।  यह अत्यंत संक्रामक होता है। यह मल-मौखिक मार्ग, दूषित भोजन व पानी या मौखिक-मौखिक मार्ग से फैलता है।
 
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निदान
 

वायरल पृथककरण

 
पोलियो वायरस को पोलियो वायरस से पीड़ित व्यक्ति की ग्रसनी या मल से प्राप्त किया जाता है। मस्तिष्कमेरु द्रव (सीएसएफ) से वायरस का पता लगता है, लेकिन यह बेहद कम किया जाता है। 
 
यदि पोलियोवायरस को एक्यूट फ्लेसीड पैरालिसिस से पीड़ित व्यक्ति में पाया जाता है, तो आगे इसका परीक्षण किया जा सकता है। यह निर्धारित करने के लिए कि वायरस "वाइल्ड टाईप" (वायरस, जो कि पोलियो रोग का कारण है) या वैक्सीन टाईप  (वायरस, जो कि वैक्सीन के खिंचाव से उत्पन्न हुआ है) है। इसके लिए ओलईगोन्युक्लियोटाईड्स मैपिंग (फिंगरप्रिंटिंग) या जीनोमिक सिक्युऐन्सिंग का उपयोग किया जाता है।
 

सीरम विज्ञान

 
जब तक रोगी को अस्पताल में भर्ती किया जाता है, तब तक निष्क्रिय एंटीबॉडी जल्दी दिखाई देते हैं और उच्च स्तर पर होते है; इसलिए, एंटीबॉडी टाईटर में चार गुना वृद्धि का प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है।
 
मस्तिष्कमेरु द्रव
 
पोलियो वायरस के संक्रमण में सामान्यत: सीएसएफ में सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि (10-200 कोशिकाओं/mm3 मिलीमीटर क्यूबिक, मुख्यत: लिम्फोसाइट) और हल्का उच्च प्रोटीन (40-50 मिलीग्राम/100 मिलीलीटर) होता है।
 
संदर्भ:
 
 
 

प्रबंधन
 
क्योंकि पोलियों के लिए कोई उपचार नहीं है, रोगी को सहायक उपचार दिया जाता है। जब तक रोगी पूरी तरह से ठीक नहीं हो जाता है, तब तक उसके लक्षणों को उपचारित करने के लिए सामान्यत: सहायक देखभाल प्रदान की जाती है। पोलियो के लक्षणों के उपचार में दवाएं, व्यायाम और संतुलित आहार शामिल है।

जटिलताएं
 

1. पैरालिटिक पोलियो मांसपेशियों का अस्थायी या स्थायी पक्षाघात, विकलांगता तथा  कूल्हों,  टखने व पैरों की विकृति उत्पन्न करता हैं। हालांकि कई विकृतियों को सर्जरी और भौतिक चिकित्सा से उपचारित किया जा सकता है। इन उपचारों का विकल्प विकासशील देशों में नहीं हैं, जहां पोलियो अभी भी स्थानिक है। परिणामस्वरूप पोलियो से पीड़ित बच्चे गंभीर विकलांगता के साथ अपना जीवन व्यत्तीत करते हैं। 

2. सुई से द्रव निकालने की प्रक्रिया। 

3. निमोनिया। 

4. कोर पुलमोनले। 

5. चलने में असमर्थता। 

6. फेफड़ों की समस्याएं। 

7. फुफ्फुसीय शोथ। 

8. आघात। 

9. स्थायी मांसपेशी पैरालाईसिस। 

10. मूत्र मार्ग में संक्रमण।

 
संदर्भ:
 
 

रोकथाम
 
आज तक किसी भी तरह के उपचार की अनुपलब्धता के कारण रोग के प्रसार को नियंत्रित तथा रोकने का सबसे बेहर उपाय टीकाकरण है।  
 
पोलियो रोग से बचने के लिए दो तरह के टीकें होते हैं: निष्क्रिय पोलियो वैक्सीन (आईपीवी) और मौखिक पोलियो वैक्सीन (ओपीवी)। आईपीवी को रोगी की उम्र के आधार पर कंधे या पैर में लगाया जाता है। पोलियो वैक्सीन एक ही समय पर अन्य टीकें के साथ दिया जा सकता है। 
 
अधिकांश लोगों को पोलियो वैक्सीन तब दी जानी चाहिए, जब वे बच्चे होते है। बच्चों को आईपीवी की चार खुराकें दी जाती हैं, पहली ख़ुराक दो महीने की अवस्था, दूसरी ख़ुराक चार महीने की अवस्था, तीसरी ख़ुराक छह से आठ महीने की अवस्था तथा चौथी ख़ुराक चार से छह वर्ष की अवस्था में दी जानी चाहिए।
 
ओरल पोलियो वैक्सीन (ओपीवी) जीवित-तनु (कमजोर) वैक्सीन है, इसमें तीन प्रकार का पोलियो का वायरस होता है। 
 
पल्स पोलियो प्रतिरक्षण कार्यक्रम के तहत पांच वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों को प्रतिवर्ष ओरल पोलियो वैक्सीन की दो खुराक दी जाती हैं। इस कार्यक्रम में ओरल पोलियो वैक्सीन दी जाती है, यह न केवल बच्चे की रक्षा करता है बल्कि इसे समुदाय में भी प्रसारित किया जाता है, ताकि इसके परिणामस्वरुप अत्यधिक संरक्षण प्राप्त हों।
 
संदर्भ:
 
 
 

  • PUBLISHED DATE : Jan 25, 2018
  • PUBLISHED BY : NHP Admin
  • CREATED / VALIDATED BY : Sunita
  • LAST UPDATED ON : Jan 25, 2018

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