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कला-आज़ार

काला-अजार धीरे-धीरे पनपने वाला देशी रोग है। यह रोग लीशमैनिया जीनस के प्रोटोजोआ परजीवी के कारण होता है। भारत में केवल लीशमैनिया डोनोवनी परजीवी इस रोग का कारण है। यह परजीवी मुख्य रूप से रैटिकुलोऐंडोथैलियल प्रणाली को संक्रमित करता है तथा यह अधिकता में अस्थि भज्‍जा, स्‍पलीन तथा यकृत में पाया जाता है।

पोस्ट काला अजार डरमल लीशमैनियासिस (पीकेडीएल)।

पोस्ट काला अजार डरमल लीशमैनियासिस वह स्थिति है, जिसमें डोनोवनी परजीवी त्वचा की कोशिकाओं में पहुँच जाता है। यह परजीवी त्वचा में रहता है तथा वहाँ विकसित होता है एवं त्वचीय घावों के रूप में दिखाई देता है। आमतौर पर कालाजार से पीड़ित कुछ भारतीय रोगियों में एक से दो वर्ष या अधिकांशत: काला अजार उपचारित होने के बाद पीकेडीएल विकसित हो सकता है। यह काला अजार से पीड़ित हुए बिना बेहद कम पाया जाता है। वर्तमान में यह माना जाता है, कि पीकेडीएल आंतों के चरण से गुजरे बिना भी प्रकट हो सकता है। हालांकि, पीकेडीएल की उपस्थिति का पर्याप्त डेटा बनाना अभी बाकी है।

राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम:

इस मॉड्यूल की सामग्री, डॉ इंदु ग्रेवाल, केन्द्रीय स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो नई दिल्ली द्वारा दिनांक 3 नवंबर 2014 को प्रमाणित की गई है।

सन्दर्भ:
http://nvbdcp.gov.in/kala-new.html
http://www.who.int/topics/leishmaniasis/en/
http://www.cdc.gov/parasites/leishmaniasis/health_professionals/

 

The content of this module has been validated by Dr. Indu Grewal, Central health Education Bureau New Delhi , on 3rd November 2014.

  1. प्राय: बार-बार, रुक-रुककर या दोहरी गति से बुख़ार आता है।
  2. बढ़ती दुर्बलता के साथ भूख में कमी, पीलापन और वज़न घटता है।
  3. कमजोरी।
  4. त्वचा- सूखी, पतली और पपड़ीदार हो जाती है तथा बाल झड़ भी सकते हैं। गोरे व्यक्तियों के हाथों, पैरों, पेट और चेहरे की त्वचा का रंग भूरा हो जाता है। इसी कारण काला-अजार का नाम अर्थात् भारतीय नाम ‘काला बुख़ार’ रखा गया है।
  5. एनीमिया - तेज़ी से विकसित होता है।
  6. तिल्ली का बढ़ना - तिल्ली तेज़ी से अधिक बढ़ती है और सामान्यतः यह नरम और नॉन-टेंडर (दबाने पर दर्द नहीं होता है) होती है।
  7. लीवर - यह तिल्ली के जितना नहीं बढ़ता है। यह नरम होता है और इसकी सतह चिकनी होती है तथा इसके किनारे तेज़ होते हैं।

संदर्भ:
http://www.nvbdcp.gov.in/kala-azar.html

 

भारत में काला-अजार की वेक्टर केवल फ्लेबोटोमस अर्जेटाइपस बालू मक्खी है। बालू मक्खी छोटा कीट है। यह कीट मच्छर से लगभग एक चौथाई छोटा होता है। बालू मक्खी के शरीर की लंबाई 1.5 से 3.5 मिमी के बीच होती है।

बालू मक्खियां अत्यधिक उमस, गरम तापमान, उच्च अवमृदा पानी, घने पेड़-पौधों में प्रजनन करती है। इन मक्खियों के लार्वा के भोजन के लिए उपयुक्त उच्च जैव पदार्थ वाले स्थानों की सूक्ष्म जलवायु वाली परिस्थितियां पनपने के उपयुक्त होती हैं। यह पर्यावरणीय संवेदनशील कीट कमज़ोर होता है तथा यह सुखें का सामना नहीं कर सकता है।

संदर्भ:
http://www.nvbdcp.gov.in/kala-azar.html

रोगसूचक:

दो सप्‍ताह से अधिक बुख़ार में एंटी-मलेरिया औषधियों तथा एंटीबायोटिक्‍स का कोई असर न होता है। नैदानिक ​​प्रयोगशाला में एनीमिया, प्रगतिशील ल्यूकोपीनिया थ्रोम्बोसाइटोपेनिया और हाइपरगामा ग्लोबिलिनिमिया परिणाम शामिल हो सकते हैं।

प्रयोगशाला:

सीरम परीक्षण: काला अजार का पता लगाने के लिए तरह-तरह के परीक्षण उपलब्ध हैं। सामान्यत: सबसे अधिक उपयोगी परीक्षण जो कि आपेक्षिक संवेदनशीलता; विशिष्टता और परिचालन व्यवहार्यता पर आधारित होते है, इसमें डाइरेक्ट इग्लुटिनेशन  परीक्षण (डीएटी), आरके39 डिपस्टिक और एलिसा शामिल हैं। हालांकि यह सभी परीक्षणों आईजीजी एंटीबॉडीज़ का पता लगाते है। यह एंटीबॉडीज़ खून में लंबे समय तक रहती हैं। अल्डिहाइड परीक्षण सामान्यत उपयोग किया जाता है, लेकिन यह परीक्षण अविशिष्ट होता है। आईजीएम का पता लगाने वाले परीक्षण विकासशील हैं तथा यह परीक्षण प्रभावित क्षेत्र में उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं है।

परजीवी प्रदर्शन: अस्थि मज्जा/तिल्ली/लिम्फ नोड ऐस्पिरेशन (सुई के माध्यम से पदार्थ को निकालने की विधि) में परजीवी प्रदर्शन या कल्चर मीडियम (प्रयोगशाला में उत्पन्न किए गए जीवाणु) के माध्यम से रोग की पुष्टि होती है।

हालांकि, ऐस्पिरेशन परीक्षण (सुई के माध्यम से पदार्थ को निकालने की विधि) की संवेदनशीलता अलग-अलग अंगों के आधार पर भिन्न होगी। हालांकि तिल्ली ऐस्पिरेशन परीक्षण में सबसे बेहत्तर संवेदनशीलता और विशिष्टता (स्वर्ण मानक के रूप में माना जाता है) होती है, लेकिन कुशल पेशेवर उचित सावधानियों से इसे केवल सुविधासंपन्न अच्छे अस्पताल में ही कर सकते हैं। यह केवल सांकेतिक जानकारी है। निदान और उपचार के लिए आपको अपने चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।

संदर्भ:
http://nvbdcp.gov.in/kal7.html

काला-अजार का निदान और उपचार कई कारणों की वज़ह से समस्याग्रस्त हैं। यद्यपि उपचार लंबा और अपेक्षाकृत महंगा है, फिर भी काला-अजार का पता लगाने के लिए ऊतक के नमूनों की आवश्यकता होती है। ऊतकों के नमूनों के लिए परंपरागत ढंग से ऐस्पिरेशन (सुई के माध्यम से पदार्थ को निकालने की विधि) करते है तथा ऊतकों के नमूनों को स्टैन्ड स्मीयर में डालकर माइक्रोस्कोपी द्वारा ऐमेस्टिको के रूपों की जांच की जाती है। अस्थि मज्जा, तिल्ली, और लिम्फ नोड (कुछ भागों में) के ऊतकों के नमूने की संदिग्ध संक्रमित रोगियों में सबसे अधिक जांच की जाती हैं।

स्प्लेनिक ऐस्पिरेशन की नैदानिक संवेदनशीलता (95%- 98%) अधिक है, लेकिन इस प्रक्रिया में रक्तस्राव का ख़तरा होता है; अस्थि मज्जा नमूनों के परीक्षण की संवेदनशीलता (53% - 95%) कम होती है। अंग ऐस्पिरेशन और स्मीयर के सही परीक्षण के लिए तकनीकी कौशल की आवश्यकता होती है, जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। कल्चर या पीसीआर परीक्षण ऐस्पिरेशन पदार्थ में परजीवी (पैरासिटोलोजिक) की वृद्धि करता है, लेकिन ज्यादात्तर इन विधियों को अनुसंधान प्रयोगशालाओं में ही किया जाता हैं।

भारत में काला अजार के उपचार के लिए कुछ दवाएं उपलब्ध हैं:

सोडियम  स्टिबोग्लोकोनेट।

पेंटामिडीन आईसिथेनेट।

एंफोटेरेसीन बी।

लिपोसोमल एंफोटेरेसीन बी।

मिल्टेफोसीन।

यह केवल सांकेतिक जानकारी है। निदान और उपचार के लिए आपको अपने चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।

विसीरल लीशमनियासिस (आंत लीशमनियासिस) के लिए कोई टीका या निवारक दवा उपलब्ध नहीं है। संक्रमण को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय बालू मक्खी के काटने से बचना है। निम्नलिखित सावधानियों का सुझाव काटने के ख़तरे को कम करने के लिए दिया जाता है:

आउटडोर/बाहर:

-विशेषत: शाम व सुबह आउटडोर गतिविधियों से बचें। आमतौर पर जब बालू मक्खियों सबसे अधिक सक्रिय होती हैं। जब आउटडोर जाएं (या असुरक्षित तिमाही में): त्वचा को कम खुला (खुला) रखें। इस कृत्य को जलवायु में संतोषजनक सीमा तक बढाएं जैसे कि लंबी बाजू की शर्ट व पतलून तथा मोजे पहनें; एवं अपनी शर्ट को अपनी पैंट के अंदर टक करें।

- दिखने वाली त्वचा और कपड़ों की बांह व पैरों की पतलून के सिरों के नीचे कीट से बचाने वाली क्रीम लगाएं। कीटों से बचाने वाली क्रीम के लेबल पर दिए गए निर्देशों का पालन करें। सामान्यत: कीटों से बचाने वाले सबसे प्रभावी उत्पाद वह होते है, जिनमें रासायनिक डीईईटी (एनएन-डाईऐथाइलमेंटाटोलामाइड) होता है।

इनडोर:

वातानुकूलित रखें या अन्य खुलें स्थानों पर जाली लगाएं।

- ध्यान रखें, कि बालू मक्खियां मच्छरों की तुलना में छोटी होती हैं तथा इसलिए यह छोटे छेद के माध्यम से अंदर आ सकती हैं।

- कीड़े को मारने के लिए रहने/सोने की जगहों पर कीटनाशक दवाओं का छिड़काव या स्प्रे करें। यदि आप बिना जाली लगे स्थानों या बिना वातानुकूलित क्षेत्र में सो रहे हैं, तो मच्छरदानी का उपयोग करें एवं उसे अपने गद्दे के नीचे ठीक से टांक लें।

-यदि संभव हो तो, उपयोग की जाने वाली मच्छरदानी को पैरेथ्रोइड युक्त कीटनाशक में भिगोकर या छिड़काव करके उपयोग करें। इसी पद्यति का उपयोग स्क्रीन, पर्दों, चादरों और कपड़ों (कपड़ों को पांच धुलाई के बाद दोबारा उपचारित किया जाना चाहिए) किया जा सकता है।

संदर्भ:

http://www.cdc.gov

http://www.cdc.gov/parasites/leishmaniasis/prevent.html

  • PUBLISHED DATE : Apr 21, 2015
  • PUBLISHED BY : NHP CC DC
  • CREATED / VALIDATED BY : NHP Admin
  • LAST UPDATED ON : Aug 02, 2016

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